Wednesday, October 22, 2008

"जीवन रूपी पानी"

मेरा जीवन पानी की तरह बहता चला।
पानी जिसका ना कोई रूप है और ना ही कोई आकार
जन्मलिया, कुछ बंधा रिश्तों से , कुछ उन्मुक्त बहता रहा।
बहता-बहता एक दिन जा टकराया प्यार से ,
प्यार की वादियाँ, चारों तरफ़ हरियाली, महकते हुए फूल, खुशिया ही खुशियाँ
मैं बहता रहा मस्ती से छलकते हुए।
फिर एक दिन प्यार बोला-
तुम्हे जाना होगा।
और बाँध दिया एक बाँध मेरे और उसके बीच।

मैं, मैं तो सरे रास्ते छोड़ बह चला था,

प्यार की वादियों में।

बिना राह, मैं बाँध के इस ओर बंधने लगा।

रिश्तों ने फिर आवाज़ दी॥

पर लौटू कैसे?

मैं तो बंध चुका हूँ।

रिश्तो ने नहर बने...

फिर मुझे वापस ले आए, उस दुनिया में , जो मेरी थी।

jaha मैंने जन्म लिया था॥

२२/१०/2008

Friday, October 17, 2008

"आस"

बढ चला हूँ एक अनजान राह पर,
फीर भी दिल को तेरी आस है बाकी ।
लम्हा-लम्हा घटती जा रही है दूरी,
फीर भी तेरे आने की आस है बाकी ।
दो कदम चलता हूँ और फीर पलट कर देखता हूँ,
इन ड़ब-ड़बaai आखों में, तुझे देख पाने की प्यास है बाकी ।

डगमगाने लगे है अब कदम......
टूटने लगी है साँसो की डोर.....
बंद होती इन आखों में फीर एक बार तुझे देख पाने की आस है बाकी ।
ना जाने कब टूट जाए ये जीवन-माल ,
क्या जाने पूरी हो ना हो,तुझे देख पाने की आस बाकी.

१७/१०/२००८

Thursday, October 16, 2008

अहसास नही बाकी

अहसास नही अब कोई बाकी।
रोते - रोते हँस देता हूँ,
हँसते-हँसते रो पड़ता हूँ।
हूँ क्या अब तो ये याद भी नही बाकी।
चला जा रहा हूँ,
अब तो मंजिल की तलाश भी नही बाकी।
ना खुशी हसाती है,
और ना गम ही रुलाता है।
और ना ही दर्द का अहसास,
तू जो नही है तो अहसास नही कोई बाकी॥

१५-१०-२००८

Monday, October 6, 2008

"अंहकार"

पंडित रमाशंकर अपने शहर के बहुत मशहूर पंडित थे। पुरे शहर में सभी उनका सम्मान करते थे। सारा शहर उन्हें बहुत ही न्याय प्रिया और दयालु मानते थे। यूँ तो पंडित रमाशंकर बहुत दयालु थे, पर उन्हें अपने ब्राम्हण होने पर बड़ा ही घमद था। वे सोचते कि ब्राम्हण भगवन के सबसे प्रिया और करीब होता है। और इसी गर्व से चूर होकर वो अन्य जाति के लोगो से सीधे मुह बात तक ना करते थे।
यूँ तो पंडित रमाशंकर धन-धान्य से परिपूर्ण थे,पर उन्हें सिर्फ़ एक चीज़ कि चिंता हमेशा सताती रहती थी। कि उनके वंश का नाम आगे कैसे बढेगा। पंडित रमाशंकर को ६ लड़किया थी। पर उनकी लड़का पाने कि चाह पुरी नही हो पा रही थी।
उन्होंने अपनी कुंडली का कई बार अध्ययन कई बार कर चुके थे। और उसमे पुत्र का योग भी बराबर नज़र आता था। पुत्र जो उनके वंश का नाम आगे बढ़ाएगा और उनके जीवन कि साडी परेशानी,दुःख तकलीफ का अंत कर उनका नाम रोशन करेगा। इसी पुत्र कि चाह में एक-एक करके उनके घर ६ पुत्रियों का जनम हुआ। पर उनके पुत्र कि चाहत कम न हुई।
उसी शहर में एक क्रिश्चियन परिवार रहता था। मोरिस, उसकी पत्नी नैंसी और उसका पुत्र राहुल। मोरिस के घर की परिस्थी साधारण ही थी। कुल मिला कर उनका घर चल ही जाता था। पर नैंसी को लड़कियों से बहुत प्यार था। वो हमेशा सोचती की काश उसे कोई लड़की होती। नैंसी एक हॉस्पिटल में नर्स थी। उसके सामने कितनो की लड़किया होती, तो उसके दिल में हमेशा कसक होती थी , की भगवन उसे कब लड़की देगा।
कई बार उसके मन में आया की वो कोई लड़की को गोद ले ले। पर परिवार के डर से कोई निर्णय नही ले पा रही थी।
उधर पंडित रमाशंकर की पत्नी पुनः गर्भवती हुई। पंडित रमाशंकर ने ढएरो पूजा-पाठ कियते, ताकि इस बार उन्हें पुत्र रत्ना की ही प्राप्ति हो। आख़िर वो घड़ी आ ही गई, जिसका उन्हें इंतज़ार था।
पंडित रमाशंकर की पत्नी को हॉस्पिटल ले जाया गया। वही जहा नैंसी काम करती थी। पंडित की पत्नी ने फिर एक लड़की को जनम दिया। फिर लड़की को देख कर पंडित जी का चेहरा उतर गया। उनकी jyotish vidhya फ़ैल हो गई। उन्होंने लड़की को देखा, एकदम गुडिया की तरह सुंदर। लेकिन पंडित जी ने को अपनाने से मन कर दिया.नैंसी ने देखा पंडित जी लड़की को किसी भी कीमत पर अपनाने को तैयार नही है। तो उसने डॉक्टर से कहा , यदि पंडित जी को कोई आपत्ति न हो तो मैं लड़की को गोद लेना चाहती हूँ। यदि पंडित जी को krishchian परिवार से कोई आपत्ति न हो तो। पंडित जी ने कहा की मुझे इस लड़की से कोई मतलब नही है। किसी के पास भी रहे.बस किसी को ये पता न चल पाए की ये मेरी संतान है। और इस तरह नैंसी गुडिया को अपने घर ले आई। उस बच्ची के घर में जैसे खुशिया ही खुशिया आ गई। नैंसी ने बच्ची का नाम रखा "खुशी" । नैंसी के पति को बिज़नस में बहुत मुनाफा हुआ। इस तरह खुशी अपने नाम की तरह ही उनके परिवार में खुशिया ले कर आई। और नैंसी का पूरा घर खिशी से जगमगा उठा।
और पंडित जी लड़के की चाह में , घर में आई लक्ष्मी को भी ठुकरा दिया। और अपना नाम भी न दे सके।

"कभी- कभी"

ना जाने क्यों, मचल जाता है
दिल तेरे लिए कभी-कभी।
ये जानता है कि तू नही मेरा
फिर भी ना जाने क्यों
संजोता है ख्याब ये तेरे लिए
कभी-कभी।
ये जानता है कि तू नही आएगा कभी।
फिर भी तेरी राह में,
नज़रे बिछाता है ये कभी-कभी।
मैं समझता हूँ इस दिल को लाख,
फिर भी बे-लगाम हो जाता है ये कभी-कभी।
२२/०८/2008